'भारत में धर्म और उपासना से जुड़े कुछ विचारणीय पक्ष ' के संदर्भ में
-प्रो. अंगराज चौधरी –
(बौद्ध
धर्म के आधिकारिक अध्येता
प्रो. अंगराज चौधरी ने
कापालिक के प्रथम पोस्ट
पर लम्बी टिप्पणी ईमेल
से भेजी है. कमेंट
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टिप्पणी जा नहीं सकती
थी. इसलिए इसे एक
स्वतंत्र पोस्ट के रूप
में यहाँ प्रकाशित किया
जा रहा है. )
‘भारत में
धर्म और उपासना
से जुड़े कुछ
विचारणीय पक्ष’में लेखक
ने जिस तरह
बुद्ध और महावीर
को विष्णु, शिव, दुर्गा,
राम, कृष्ण और
गणेश के साथ
रख कर प्रतीक
माना है - मैं
इससे सहमत नहीं
हूँ। इतिहास पुरुष
को इतिहास-कल्प
भी नहीं, बल्कि
कल्पित देवताओं की श्रेणी
में रखना ठीक
नहीं है।
दूसरी बात यह
है कि लेखक
का यह कथन
कि ‘व्याख्या और
विनियंत्रण के इन
दो उद्देश्यों के
पूर्ति के लिए
गढ़ी गयी अवधरणाओं
से उपासकों से
आत्मसात कराने के लिए
अनुष्ठान ( यज्ञ, पूजा और
साधना) की प्रणालियों
का विकास किया
गया, ’ बुद्ध के संदर्भ
में सही नहीं
प्रतीत होता। बुद्ध ने
हिंसक यज्ञ का
विरोध किया, शील
पालन को यज्ञ
कहा, अपने मन
के विकारों को
दूर करने को
पूजा कहा और
वैसी चित्त वृत्तियों
को धारण करने
को धर्म कहा
जिसके धारण करने
से स्वकल्याण और
परकल्याण हो। यज्ञ
स्वयं करना है, और
धर्म के मार्ग
पर स्वयं चलना
है। पुरोहितों की
सहायता से यज्ञ
करवाना तो वैसाखी
(crutches) के
सहारे चलना है।
बुद्ध
द्वारा प्रतिपादित धर्म और
दर्शन की व्याख्या
करना ही यहां
मेरा उद्देश्य है।
बुद्ध ऐतिहासिक पुरुष
थे, लेकिन अपने
श्रम और पुरुषार्थ
से उन्होंने देवत्व
को प्राप्त किया।
यहां तक कि
बुद्ध को लोग
भगवान कहने लगे-इसलिए कि उन्होंने
राग, द्वेष और
मोह को भग्न
किया था। भग्ग
रागो, भग्गदोसो, भग्गमोहोति
भगवा।
बुद्ध का दर्शन
मानवतावादी दर्शन है। उन्होंने
मनुष्य में बड़ी
शक्ति देखी और
यह भी कहा
कि मनुष्य होना
बड़ा दुर्लभ है।
मनुष्य को ही
उन्होंने सत्य कहा
- सवार ऊपर मानुष
सत्त, तहार ऊपर
नेईं-जैसे चंडीदास
ने कहा। ग्रीक
दार्शनिक की तरह
ही उन्होंने मनुष्य
को केन्द्र (centre) तथा
परिधि (circumference) कहा। मनुष्य
बेचारा नहीं। यदि वह
अपनी शक्ति पहचान
ले तो वह
महान बन सकता
है। अत्ताहि अत्तनो
नाथो - अपनी आत्मा
ही अपना नाथ
है, पर कौन
सी आत्मा? जो
सुदंत (well-tamed) हो।
वे ईश्वर
को सृष्टिकर्ता के रूप में
नहीं मानते थे।
सृष्टि कब बनी,
किसने बनायी -इसकी
व्याख्या में उन्होंने
सिर नहीं खपाया।
क्या कोई अंतिम
रूप् से कह
सकता है कि
किसने और कब
सृष्टि की रचना
की। सृष्टि के
बारे में तथा
संसार के बारे
में बुद्ध ने
सिर्फ इतना का
कि अनमताग्गोयं संसारो
- यह संसार आरंभविहीन
(beginingless) है। सृष्टिकर्ता कोई काल्पनिक
ईश्वर नहीं, बल्कि मनुष्य अपने
कर्मों से ही
संसार की सृष्टि
करता है, कर्मों
के कारण आवागमन
के चक्कर में
पड़ता है, और
दुःख भोगता है।
अपने के कारण
ही वह संसार
के पार जाकर
निर्वाण पद को
प्राप्त कर सकता
है जो मुक्ति
की, मोक्ष की
परम अवस्था है।
कर्म को
बुद्ध ने बड़ा
महत्व दिया। कम्मस्सका,
माणवा, सत्ता, कम्मदायदा, कम्मयोनि,
कम्मबंधु, कम्मपटिसरणा, कम्मसत्ते, विभजति यदिदं
हीन पणीताति। अपना
कर्म ही मनुष्य
का दायाद है,
वही उसकी योनि
है अर्थात अपने
कर्म के कारण
ही वह अच्छे या
बुरे लोक में
पैदा होता है।,
वही उसका बंधु
है और प्रतिशरण
है।
कर्म ही
मनुष्य को बड़ा
या छोटा बनाता
है, ऊंच या
नीच बनाता है।
जन्म नहीं।
न
जच्चा वसलो होति,
न जच्चा होति
ब्राह्मणों।
कम्मुना
वसलो होति, कम्मुना होति ब्राह्मणों।।
जातिवाद के खिलाफ
बुद्ध ने बहुत
से वैज्ञानिक और
व्यावहारिक कारण दिये।
क्या ब्राह्मणी जिस
तरह गर्भवती होती
है और बच्चा
जनती है, वैसी
क्या तथाकथित शूद्रों
की पत्नियां गर्भवती
नहीं होतीं, बच्चा
नहीं जनतीं? क्या
नदियां ब्राह्मणों को शुद्ध
करती हैं और
शूद्रों को नहीं?
बुद्ध द्वारा प्रतिपादित
धर्म में कर्म
का बड़ा महत्त्व
है। अच्छे कर्म
का अच्छा फल
और बुरे कर्म
का बुरा फल
और निःस्पृह हो
कर किये गये
कर्म का कोई
फल नहीं। वीततृष्ण
अर्हत द्वारा किये
गये कर्म का
कोई फल नहीं
होता- न कुशल,
न अकुशल। इसी
को क्रिया चित्त
कहा जाता है।
एक बात
और इस धर्म
में कर्म का
इतना महत्त्व है
कि यहां न
तो कोई वर
देता है और
न अभिशाप। बुद्ध
भी वर नहीं
देते। सब कुछ
कर्म के अधीन
है। बुद्ध का
शाप वरातीत है।
मनुष्य दुःख भोगता
है अपने कर्मों
के कारण। इसलिए
बुद्ध के प्रतीत्व
समुत्पाद के नियम
अथवा कारण-कार्य
नियम द्वारा अपने
दुःख की सृष्टि
आप करता है,
अपनी अज्ञानता के
कारण और अपने
ज्ञान जगा कर वह
इस दुःखमय संसार
से बाहर निकल
कर वह निर्वाण
का अभिगम कर
सकता है, जहां
शांति ही शांति
है।
इस प्रतीत्वसमुत्पाद
की प्रथम कड़ी
है अविद्या पच्चया
सङृखारा अर्थात अविद्या के
कारण यथार्थ (reality) को
न जानने के
कारण हम प्रतिक्रिया
करते हैं और
अपने बंधनों का
निर्माण करते हैं।
बुद्ध बहुत बड़े
मनोवैज्ञानिक थे। फ्रायड
और युंग से
भी बड़े। उन्होंने
मन की बहुत
बारीकी से, सूक्ष्मता
से व्याख्या की।
मन चंचल है।
अपने विचारों के
कारण जैसे लोभ,
द्वेष, मोह के
कारण तृष्णा उत्पन्न
करता है, वैसी
तृष्णा जो दुष्पूर्णीय
है। मन के
अवचेतन (subconscious) तथा अचेतन
(unconscious) भाग में वह
दिन-रात तृष्णा
उत्पन्न करता है
और तृष्णा का
पूरा न होना
ही दुःख है।
अतः मनुष्य अपने
दुख की सृष्टि
आप करता है
और वही दुख
से मुक्त हो
सकता है यदि
वह उस प्रक्रिया
को बदल दे
जिससे दुःख उत्पन्न
होता है। प्रक्रिया
बदलने के लिए
शील, समाधि तथा
प्रज्ञा समन्वित मार्ग पर
चलना होता है।
उन्होंने जिन चार
आर्य सत्यों की
बात कही, उसमें
प्रथम दुःख है,
द्वितीय है दुख
का कारण, तृतीय
है दुःख निरोध
और चतुर्थ है
दुःख निरोधगामिनी प्रतिपदा
अर्थत दुःख का
निरोध करने वाला
मार्ग। दुःख का
कारण दुष्पूर्णीय तृष्णा
है और हम
तृष्णा उत्पन्न करते हैं
अज्ञानता में। यदि
हम जान जायें
कि दुनिया की
सभी चीजें नश्वर
हैं, तो हम
विराग का विकास
कर निर्वेद हो
निर्वाण का अधिगम
करेंगे। निर्वाण एक ऐसी
अवस्था है जहां
‘वाण’नहीं, तृष्णा नहीं,
वह तृष्णातीत अवस्था
है।
तो इस
अवस्था को कैसे
पाया जा सकता
है? मन पर
नियंत्रण कर। चूकि
मन बड़ा ही
चपल है, चंचल
है, चारों ओर
भागता रहता है।
यह कभी इस
सुंदर चीज को
चाहता है कभी
उस असुंदर से
घृणा करता है।
दोनों ही हालातों
में वह तृष्णा
उत्पन्न करता है,
एक की प्राप्ति
के लिए और
दूसरे से दूर
रहने के लिए।
वह इतना चंचल
है कि हर
क्षण सोते-जागते
तृष्णा उत्पन्न करता ही
रहता है। तो
मन पर नियंत्रण
कैसे करें?
मन पर
नियंत्रण हम शील
पालन से कर
सकते हैं। यदि
हम चोरी न
करें, हिंसा नहीं
करें, झूठ नहीं
बोलें और मादक
द्रव्यों का सेवन
न करें तो
हम लोभ् से,
द्वेष से, क्रोध
से, वासना से
तथा इस तरह
के तमाम मानसिक
क्लेशों से या
विकारों से छुटकारा
पा सकते हैं,
यही शील है।
मन पर नियंत्रण
कर सकते हैं
तथा इस तरह
मन पर नियंत्रण
कर एकाग्रता प्राप्त
कर प्रत्यक्ष ज्ञान
की प्राप्ति अनुभव
के धरातल पर
कर सकते हैं।
मन पर नियंत्रण
समाधि है और
अनुभव के धरातल
पर प्राप्त ज्ञान
प्रज्ञा है।
बुद्ध द्वारा प्रतिपादित
अष्टांगिक मार्ग शील, समाधि
तथा प्रज्ञा से
समन्वित है। शील
का अर्थ है
सम्यक वाणी, सम्यक
कर्म और सम्यक
आजीविका। समाधि का अर्थ
है सम्यक स्मृति,
सम्यक समाधि और
सम्यक व्यायाम और
प्रज्ञा का अर्थ
है सम्यक दृष्टि
और सम्यक संकल्प।
शील के पालन
से समाधि लगती
है, बलवती होती
है तथा इस
प्रकार पज्ञा की प्राप्ति
होती है।
बुद्ध ने अष्टांगिक
मार्ग का उपदेश
दिया जिस पर
चल कर कोई
भी निर्वाण पा
सकता है। पर
यह मार्ग ऐसा
है जिस पर
चलने वाला न
सिर्फ इस पर
स्वयं चलता है
बल्कि इसका निर्माण
भी करता है।
यह स्वर्णिम चतुष्कोण
(Golden quadrangle) की तरह नहीं
जिसका निर्माण सरकार
करे और चले
इस पर सब
कोई। अष्टांगिक मार्ग
पर स्वयं चलना
होता है, कोई
दूसरा किसी का
प्रतिनिधित्व (Proxy) नहीं कर
सकता।
अष्टांगिक मार्ग पर
चलने का अर्थ
है शील का
पालन करना, मन
को एकाग्र करना
तथा प्रज्ञा जगाना
ताकि से यह
देख कर कि
सब कुछ अनित्य
है, निर्वेद की
प्राप्ति कर सके।
संक्षेप में यही
धर्म है।
धर्म का
अर्थ है धारण
करना- धाररेतीति धम्मो।
धारण तो वही
किया जायेगा न,
जिससे सुख-शांति
मिले अशांति न
मिले। क्रोध आने
पर मनुष्य स्वयं
जलता है और
दूसरों को भी
जलाता है। तो क्रोध
को क्यों धारण
किया जाये? लोभ
आने पर चोरी
करता है जिससे
वह डरा-डरा
रहता है, कि
कहीं पुलिस पकड़
न ले। तो
वह चोरी क्यों
करे?
तो बुद्ध
ने बताया कि
धर्म किसी काल्पनिक
देव या ईश्वर
की पूजा करना
नहीं, बल्कि उन
गुणों को धारण
करना है जिससे
सुख-षांति मिले।
धर्म की जो
परिभाषा बुद्ध ने की,
वह बड़ा ही
महत्त्वपूर्ण है। ऐसे
धर्म का अभ्यास
कर मनुष्य सुख
और शांति पा
सकता है, दुःख
से छुटकारा पाकर
सुखी जीवन जी
सकता है और
अंततः सभी प्रकार
की तृष्णाओं को
दूर कर बीततृष्ण
हो सकता है
और सुखमय शांतिमय
जीवन बिता सकता
है।
बुद्ध ने आत्मानुभव
को बड़ा महत्त्व
दिया। केसमुत्ति सुत्त
में उन्होंने कहा
है कि किसी
की बात मत
मानो, न अपनी
परंपरा की न
अपने धर्मग्रंथ की,
न तर्कसंगत होने
के कारण, न
इस कारण कि
कहने वाला हमारा
पूज्य आचार्य है
तथा उसका व्यक्तित्व
भव्य और आकर्षक
है। अपने अनुभव
से जो बात
अकुशल होने लगे
उन्हें मत मानो,
मानो उसे जिसे
स्वानुभव से जानो
कि यह तुम्हारे
लिये तथा औरों
के लिए भी
हितकर है। बुद्ध
द्वारा उपदिष्ट यह सुत्त
मानव के स्वतंत्र
चिंतन का स्वतंत्र
घोषणापत्र (Magna Carta) है।
इस तरह
बुद्ध का धर्म,
शील और सदाचार पर
आधारित तथा पज्ञा-प्रसूत है। यह
स्वानुभव पर आधारित
धर्म है। इस
धर्म का पालन
कर आत्मनिर्भर हो
हम अपना कल्याण
कर सकते हैं।
यही तो शुद्ध
और सही धर्म
है। यह धर्म
आत्मनिर्भर होना सिखाता
है, दूसरों पर
निर्भर होना नहीं।
यह ऐसा धर्म
है जो ईश्वर केन्द्रित
नहीं जो शील,
समाधि प्रज्ञा समन्वित
है, जो स्वानुभव
पर आधारित है।
ऐसे धर्म में
कालक्रम में विकृतियां
आयीं।
बुद्ध और महावीर
श्रमण परंपरा में
आते हैं। इनका
धर्म श्रम पर
आधरित है। बुद्ध
ने कहा- तुम्हेहि
किच्चं आतप्पं - तुम्हें बहुत
काम करना होगा
- आष्टांगिक मार्ग पर चलने
के लिए, तभी
सच्चे धर्म की
प्राप्ति होगी। प्राकृत भाषा
में उन्हें समण
कहा जाता है।
यहां सम का
अर्थ है शांति
चाहने वाला।
बुद्ध के महापरिनिर्वाण
के बाद धर्म
के अभ्यास के
लिए जो श्रम
आवश्यकथा, उसमें भिक्षुगण ढीले
पड़ गये। विनय
के नियम का पालन करना था,
उसकी की उपेक्षा
करने लगे। इसका
कारण था कि वे
निहितार्थ को नहीं
समझ पाये। उन्हें
लगा कि बुद्ध
ने जो नियम
बनाये हैं वे
कठोर हैं और
वह उनकी
स्वतंत्रता पर प्रहार
है। इसलिए वे
लालची (greedy) और
लापरवाह (lax) हो गये,
भोजन में लोभी और
नियम पालन में
ढ़ीले।
बुद्ध के महापरिनिर्वाण
के लगभग 100 वर्ष
के बाद बज्जिपुत्तक
भिक्षु विनय विरुद्ध
दस बातें करने
लगे जैसे स्वाद
के लिए श्रृंग
में नमक रखने
लगे। खाने-पीने
के संबंध में
बुद्ध ने जो
नियम बनाये थे
(वे स्वस्थ रहने
तथा श्रम करने
के लिए ठीक
थे) उनको भिक्षु
तोड़ने लगे। धीरे-धीरे आत्मा,
अर्हत, बुद्ध आदि के
बारे में विचार
बदल गये।
पूर्व शैलीय भिक्षुओं
का कहना था
कि अर्हत को
निर्वाण के बारे
में संदेह और
अज्ञानता नहीं होती
पर जहां तक
लौकिक ज्ञान है
वह उन्हें नहीं
होता। 18 संप्रदायों में बंटे
ये भिक्षु, संसार,
आत्मा और ज्ञान
का अलग-अलग
अर्थ करने लगे।
उत्तरापथक के अनुसार
गृहस्थ भी अर्हत
हो सकते हैं।
थेरवादी के अनुसार
गृहस्थ अर्हत होते ही
गृहस्थ भिक्षु बन जाते
हैं। वज्जिपुत्तक और
सम्मितिय शाश्वत आत्मा में विश्वास
करते थे। वज्जिपुत्तक,
सम्मितिय और सर्वास्तिवादी
मानते थे कि
अर्हत का भी
पतन हो सकता
है। सम्मितियों का
मानना था कि
बुद्ध के पाखने
की गंध बहुत
अच्छी होती है।
इस
तरह हम देखते
हैं कि कहां
बुद्ध का उदात्त
धर्म जो शील,
समाधि तथा पज्ञा
पर आधारित था
और कहां
18 संप्रदायों में बंटे
भिक्षुओं की हास्यास्पद
मान्यताएं। इस तरह
धर्म का पतन
हुआ।
पर धर्म
तो धर्म है। अभ्यास
करने वालों के
कारण उसकी व्याख्या
अलग-अलग होने
लगी।
(नवनालंदा महाविहार, नालंदा के
अवकाश प्राप्त प्रोफ़ेसर। सम्प्रति
: संपादक, विप्पस्सना शोध संस्थान, इगतपुरी, नासिक)

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